ईश्वर प्राप्ति का उपाय, ईश्वर - ईश्वर प्राप्ति के लक्षण।
ईश्वर प्राप्ति का उपाय।
जैसे एक पक्षी अपने पंखों के सहारे एक स्थान से दूसरे स्थान तक उड़ता है, वैसे ही जीव कर्म और धर्म, इन दो पंखों के सहारे जीवन-पथ पर आगे बढ़ता है। जैसे पक्षी अपने अर्जित ज्ञान और दृढ़ विश्वास के बल पर अपने प्रिय गंतव्य तक पहुँचता है, वैसे ही जीव निष्काम कर्म, निष्काम धर्म और ज्ञानयोग से प्राप्त ज्ञान तथा दृढ़ विश्वास के द्वारा, भक्ति और प्रेम (अजपाजपः) के सहारे अपने परम प्रिय गंतव्य,ईश्वर के धाम तक पहुँचता है।
ईश्वर प्राप्ति के लक्षण।
ईश्वर प्राप्ति (ईश्वरप्राप्ति) के कुछ सामान्य लक्षण होते हैं, जो विभिन्न धर्मों और आध्यात्मिक मार्गों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं। हालांकि, कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं।
1.भगवान का नाम लेते ही आँखों से आँसू छलक पड़ते हैं, आवाज भर आती है, और शरीर भक्ति के आनंद से पुलकित हो उठता है।
2.अहंकार समाप्त हो जाएगा। अखंड शांति और आनंद की अनुभूति होगी।
3.असीम प्रेम और करुणा का अनुभव होगा। भगवान की शरण में मनन और चिंतन करने से अश्रु बहने लगेंगे।
4. भगवान का मनन और चिंतन प्रबल होगा, फलस्वरूप अन्यमनस्कता आएगी। सांसारिक आसक्तियों (माया-मोह) से मुक्ति मिल जाएगी।
5.चेतना ऊँचे स्तर पर पहुँच जाएगी और समभाव विकसित होगा।
6.सुख-दुख, जय-पराजय, लाभ-हानि,सब कुछ समभाव से स्वीकार करने की क्षमता विकसित होगी।
7.आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव होगा।
8.जो व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त करता है, वह केवल विश्वास नहीं करता बल्कि प्रत्यक्ष रूप से दिव्य उपस्थिति का अनुभव करता है।
9.इच्छाएँ और इंद्रिय विषयों की लालसा समाप्त हो जाएगी।
10.शारीरिक और इंद्रिय भोगों की प्रवृत्ति धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है और चेतना पूर्ण रूप से ईश्वर में लीन हो जाती है।
11.एक दिव्य प्रकाश, ज्ञान या ईश्वर की उपस्थिति अंतःकरण में अनुभव होगी।
12.स्थिरता और धैर्य का भाव प्राप्त होगा।
14.अनन्य भक्ति और समर्पण तीव्र हो जाएगा।
15.यह भावना इतनी प्रबल हो जाएगी कि व्यक्ति मंत्र-जप और पूजा आदि करने में भी असमर्थ हो सकता है, क्योंकि उसकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगेंगे।
16.आत्मा स्वाभाविक रूप से ईश्वर का नाम जपने लगेगी (अजपा जप), और वह प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर का दर्शन करेगा।
प्रेम, भक्ति, साधना और सत्य की खोज के माध्यम से कोई भी इस अवस्था तक पहुँच सकता है। हालाँकि, यह एक बहुत कठिन यात्रा है, और बिना ईश्वर की कृपा के यह लगभग असंभव है। कृपया ऊपर बताए गए ईश्वर प्राप्ति के लक्षणों की नकल न करें, इन लक्षणों की नकल करना व्यक्ति को भ्रम और संकट में डाल सकता है।
भगवान्
यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण,
स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स इति कथ्यते भगवान्।
यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् जगतः कारणं नियन्ता स ईश्वरः।
यः ईश्वरः स एव भगवान् स परमब्रह्मादिदेवः सनातनः॥
श्रीपरब्रह्मैककर्तृस्तुतिः
इदं जगति न दृश्यते कश्चिद् देवं असुरं नरं यक्षम्।
योऽसृजत् जीवान् ससागरं जलं वायुं धरां दिव्यम्।
सृष्टिं करोति समर्थं केवलं श्रीपरब्रह्मपरमेश्वरम्।
तस्य सह संलग्नान् तिष्ठन्ति तस्य अंशावतारकलेवरम्॥
भगवत्प्राप्तेः सरलमार्गः
सुतस्नेहे हरिसेवनम्
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
सुतम् ईश्वरांशं मन्यमानः कथं करिष्यति हरिसेवनम्॥
जीवः स्वभावतः प्रकृतेः नियमेन स्नेहं करोति स्वसन्ततेः।
यः जीवः सुतसन्ततिम् ईश्वरांशत्वेन मन्यते च सेवते।
स्नेहं तत्र भगवद्भावेन योजयन्, सहजमेव जीवः परमपदं प्राप्नोति।
एतत् कर्म केवलं षड्रिपून् निगृह्य एव सम्भवति॥
इति सनातनधर्मस्य सुतस्नेहे हरिसेवनस्य वर्णनं सम्पूर्णम्॥
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बालगोपालेन ईश्वरलाभः
(मुक्तछन्दः)
मानवो धर्मं कर्म च न जानन्नपि गृहे स्थापयति बालगोपालम्।
चिन्तयन्ति ते,बालगोपालस्य सेवया एव प्राप्स्यन्तीति परं पदं।
धर्मं वदति वारं वारं,ईश्वरप्राप्तौ प्रथमं शुद्धं मनोऽवश्यकम्।
निष्कामं कर्म,निष्कामो धर्मो,भक्तिर्भक्तसम्मानश्च प्रयोजनम्॥
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बालगोपालेन ईश्वरलाभः
(मुक्तछन्दः)
मानवोऽजानन् धर्मं कर्म च गृहे स्थापयति बालगोपालम्।
चिन्तयन्ति ते, बालगोपालस्य सेवया एव प्राप्स्यन्ति परं पदम्।
धर्मं वदति वारं वारम्, ईश्वरप्राप्तौ शुद्धं मनः प्रथमम् आवश्यकम्।
निष्कामं कर्म, निष्कामो धर्मः,भक्तिः भक्तसम्मानश्च परमं साधनम्॥
जगदेककारणपरब्रह्मस्तोत्रम्
इदं जगति न दृश्यते कश्चिद् देवं असुरं नरं यक्षम्।
योऽसृजत् जीवान् ससागरं जलं वायुं धरां दिव्यम्।
सृष्टिं करोति समर्थं श्रीजगदीश्वरं जगदेककारणं नित्यम्।
तं श्रीपरब्रह्मपरमेश्वरं वन्दे तदंशावतारकलेवरम्॥
ईश्वरः तस्य च कार्यम्।
ईश्वरस्य नास्ति आदिः, न च तस्यास्ति अन्तः।
अतः सः सदा अनादिः, अतः सः सदा अनन्तः।
ईश्वरः न करोति जादुं, न च अप्राकृतिकं कर्म।
सः सर्वभूतानां नियन्ता, तेनैव करोति कर्म।
ईश्वरदेवतादर्शनम्।
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
पृथिव्यां जीवः कथं प्राप्नोति देवतानां दर्शनम्?
छायाज्योतिषु भक्तात्मा साक्षात् पश्यति देवम्।
आकाशनादं श्रुत्वा साक्षात् पश्यति देवम्॥
ईश्वरदर्शनं स्वधाम्नि स्वशरीरे च दृश्यते।
परधाम्नि सूक्ष्मदेहे च अवतारस्वरूपे दृश्यते॥
कदाचित् प्रमाणयुक्ते स्वप्ने ईश्वरं पश्यति भक्तज्ञानी।
एवमेव हि तानि सर्वाणि ईश्वरस्य प्रमाणानि सन्ति॥
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अजपाजपः
प्रथमं वाचिकजपः सुस्पष्टो मनोहरः ।
शब्दान् प्रत्यक्षतो वेत्ति निरन्तरस्मृतिपरः ॥
ततः शनैः शनैरन्तर्मन्त्रः स्वयं निनादति ।
न यत्नोऽत्रावशिष्यते सुखपूर्णं प्रवर्तते ॥
मन्दं मन्दं प्रवृत्तोऽयं न ममाधिपतिः क्वचित् ।
मानसोऽयं जपः स्वाभाविकः सुसमाहितः ॥
वातवेग इवायं तु स्वयमेव प्रवर्तते ।
वनान्तरेषु सङ्गीतमिव शान्तं निराकुलम् ॥
अन्ते कर्तृत्वभावोऽयं क्षीणो भूत्वा प्रकाशते ।
निःशब्दा निश्चला प्रज्ञा चिदानन्दघना भवेत् ॥
प्राणस्पन्दः स्वतः सूक्ष्मः कुण्डलिन्याः प्रवर्तते ।
अनाहतनिनादोऽयं हृदि मन्त्रज्योतिरव्ययम् ॥
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| शिशुरूपेण चञ्चलस्वभावेन रमते भगवान् जगत्पतिः। अस्मिन् रूपे भगवान् भक्तात्मनः परिचयं ददाति॥ |
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| स्वप्न प्रायः मिथ्या होते हैं, प्रमाण से ही वे सत्य बनते हैं। |
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| अनुभूति प्रायः स्वप्नसदृश्य मानी जाती है। |
हर प्राणी में देखे जो ईश्वर की ही काया,
वही है ज्ञानी, वही भक्त, वही ईश्वर की छाया।
न तिलक , न माला, न ऊँचे ज्ञान के बोल,
सेवा, दया, करुणा - यही है मोक्ष की डोर।
त्यागो दंभ, अहंकार - अपनाओ नम्रता,
जहाँ प्रेम हो, करुणा हो - वहीं है ईश्वरीय सत्ता।
प्रभु को पाना है तो बनो हर जीव का सखा,
सेवा ही है साधन सबका, प्रेम ही है सब कुछ की दवा।
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ये अस्मिन् मर्त्यलोके आत्मसाक्षात्कारं लभन्ते,
ते सर्वदुःखनिवृत्त्या परमशान्तिं प्राप्य विजित्य तिष्ठन्ति।
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